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हाथ से मैला ढोने वालों का प्रभावी पुनर्वास कार्य

Effective rehabilitation of manual scavengers
आरंभ करने की तिथि :
Jan 01, 2015
अंतिम तिथि :
Jul 17, 2015
04:15 AM IST (GMT +5.30 Hrs)
प्रस्तुतियाँ समाप्त हो चुके

हाथ से मैला ढोने वाले काफी हद तक निरक्षर हैं और कारोबार करने या ...

हाथ से मैला ढोने वाले काफी हद तक निरक्षर हैं और कारोबार करने या स्वरोजगार उद्यम शुरू करने के लिए उनके पास कोई साधन या योग्यता नहीं है। अतः वैकल्पिक व्यवसायों के माध्यम से उनके पुनर्वास का कार्य अत्यंत चुनौतीपूर्ण है।

वे कौन से तरीके हैं जिनके माध्यम से इन्हें अन्य व्यवसायों में लाभकर रूप से नियोजित किया जा सकता है ताकि उन्हें मैला ढ़ोने का कार्य फिर से नहीं करना पड़े? प्रतिभागी अपनी जानकारी के हिसाब से इस कार्य से संबंधित सफलता की कहानी साझा कर सकते हैं।

फिर से कायम कर देना
776 सबमिशन दिखा रहा है
subodh kumar
subodh kumar 11 साल 3 महीने पहले
Sir, Indian school curricula should be modernized and more objective with our daily life. Biotechnology that links all life with health and environment is being taught as courses specifically designed for school children in NewZealand. NZ is a country that depends on 40% of its GPDP on cows. Therefore this should be great relevance to India a great cow loving nation
Mansi butola
Mansi butola 11 साल 3 महीने पहले
sir, i live in Dehradun the main problem i am facing personally is regarding disposal of garbage....there is not a single dustbin in my area....and when i searched for dustbin there was not any over 5 km distance,though garbage points(openly littered garbage) many... its a real portrait of the capital where mere the slogans of clean india are at the par but not work has been done yet...
Alok Upadhyay
Alok Upadhyay 11 साल 3 महीने पहले
प्रधानमंत्री महोदय जी, आपने अपनी जीवट एवं कर्तव्यनिष्ठ व्यक्तित्व का परिचय देते हुए सफलता का नया आयाम स्थापित किया है, वो बहुत ही प्रशंशनीय है। मैं स्वक्षता के मुद्दे पर एक बात कहने जा रहा हु और मैं चाहता हु की आप इस पर ध्यान दे। और इसे गंभीरता से ले। आज भारत प्रदुषण की एक गंभीर समस्या से जूझ रहा है। इसके अनेक कारण है, किन्तु एक कारण जो हमारे सामने अस्पष्ट है, उसपर हम ध्यान नही दे रहे।और वो शब्जियों और और किराने की दूकान पर प्रयोग किया जाने वाला 'पॉलिथिन बैग'। मैं जानता हु ये सुचना देने वाला मैं प्रथम व्यक्ति नही हु।लेकिन ये पॉलिथिन छोटा है लेकिन बहुत ही खतरनाक है। पूरे पर्यावरण को खा जाएगा। न मिटटी अन्न उपजाने के लायक रह जायेगी और न पानी पिने योग्य रह जाएगा। हवा स्वांस लेने योग्य नही रह जायेगी। फिर सोचिये की ये मानवता कहा जायेगी !? पॉलिथिन बैग के बहुत सारे विकल्प हैं। लेकिन इस गन्दी चीज के अत्यधिक प्रयोग के कारण उन विकल्पों पर आधारित उद्योग दम तोड़त नज़र आ रहे हैं। यदि आप पोलिथिन के प्रयोग को यदि अपने प्रभाव से सम्पूर्ण भारत में बंद करा देते हैं तो हमारे 'स्वक्ष भारत मिशन' की आधी संकल्पना स्वयम पूर्ण हो जायेगी। मैं चाहता हु की आप इस पोलिथिन को गंभीरता से ले एवं सर्वप्रथम इसके सम्पूर्ण उन्मूलन का सौगंध ले। पूरी धरती पोलिथिन से पटी हुई है। ये धरती माता की जीवनदायनी ऊर्जा को चूस रही है। इसके विरुद्ध ऐसा कड़ा कानून बनाये कि लोग पोलिथिन को हांथ में लेने से भी डरे। े
Subhas Mishra
Subhas Mishra 11 साल 3 महीने पहले
मोदीजी, दवाएं तो गरीब के पास रहने दीजिए | मेरी प्रधानमंत्री जी से एक दरख्वास्त है। आपकी सरकार गरीबों ने बनवाई है, आम लोगों ने बनवाई है। आपकी पार्टी ने जिन राज्यों (उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखण्ड) में भारी जीत दर्ज की, वे गरीब राज्यों की श्रेणी में आते हैं। वहां की जनता को उम्मीद थी कि आप आएंगे तो उनका कुछ भला करेंगे। अभी भी उनकी यह उम्मीद टूटी नहीं है। उन्हें अब भी लग रहा है कि मोदी जी कुछ न कुछ जरूर करेंगे। पर यकीन मानिए, एक बार यह भरोसा टूटा, तो आप लाख कोशिश क
RAKESH SINGHAI
RAKESH SINGHAI 11 साल 3 महीने पहले
This problem can be tackled in a single day.it has happened in andhrapradesh .Simply destroy the dry latrines wherever they are.it is illegal anyway. One may wonder,what will the users of these toilets do.they may as well defecate in the open for few days before they construct their toilets. All the scavengers will find alternate employment.govt must help them relocate to different towns so that they can mingle with rest of the society.