Srikant Dubey
7 साल 4 महीने पहले
आज हमारी संस्कृति बदल रही है लोग आज दुसरो की दी हुई किताबो को कम पसंद करते है लेकिन फिर भी समाज में अभी भी एक वर्ग है जो पुराणी किताबो से पढ़ने को मजबूर है। अतः उस आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए छोड़ी हुई किताबे किसी वरदान से कम नही है। वैसे भी किताबे हमारे चरित्र का निरमाण करती है और हमे भी एक दूसरे के सहयोग में उन शिक्षाप्रद किताबो को किसी जरूरत मंद को दे देने से एक सुकून मिल सकता है और सहयोग भी हो जाता है। धन्यवाद श्रीकांत दुबे कानपूर
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