Dr Usha Shukla
11 महीने 2 सप्ताह पहले
महोदय
एक बार पुनः निवेदन!
एक युग में साहित्य समाज का दर्पण माना जाता था इसलिए भारतीय प्राचीन साहित्य में खलनायक के रूप में राक्षसों और असुरों की कल्पना की गई थी, और उनके दुखद अवसान की निश्चित प्रामाणिकता सिद्ध भी की गई थी।
आज साहित्य का रूप धारण कर लिया है दूरदर्शन और बहुसंचार माध्यमों ने यहां पर जो भी प्रदर्शित किया जाएगा वह भारत के जन जन तक मनोवैज्ञानिक प्रभाव तो छोड़ेगा -
एक बार सरसरी निगाह से देख लिया जाए कि ये संचार माध्यम क्या दिखा रहे हैं -
1- जंगल राज
2- बेईमानी और घूसखोरी
3- अनियंत्रित पटकथा
4- हत्याओं की श्रृंखला
5- रोमांस का घातक रूप
6- भूत प्रेत पुनर्जन्म जादू टोने टोटके
7- पढ़े लिखे नौकरीपेशा खलनायक जो दर्जनों अपराध करने पर भी पकड़े नहीं जाते
8- लाचार सज्जन व्यक्ति
9- धूर्त डॉक्टर और पुलिस
10- षड्यंत्र, झूठ और फरेबी योजनाएं
11- अनियंत्रित व्यक्तित्व के उदाहरण
12- संवेगों की अतिरंजित अवस्था
ये सारी स्थितियां अनुभवहीन,भोले भाले और सुझाव ग्रहणशील व्यक्तियों को मानसिक,चारित्रिक और भावनात्मक रूप से अस्थिर और दिशाहीन बना सकती हैं।
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