Ravi Gupta
10 years 4 weeks ago
उपहास किया जाता रहा है, वहीं दूसरी ओर इस असीम दिव्य ज्ञान की केवल कुछ बूंदें हासिल कर कई स्वार्थी तत्वों द्वारा तोड़-मरोड़ कर बाजारी उपभोग की वस्तुओं की तरह बेचा जाने लगा है। इस प्रकार बढ़ते व्यापारीकरण के चलते न केवल इन विद्याओं के दिव्य मूलस्वरूप के लुप्त हो जाने का खतरा बढ़ रहा है वहीं दिव्यता के अभाव में ऐसे विकृतियुक्त उपभोग के चलते इन विद्याओं का व भारतवर्ष का नाम बदनाम होने की आशंका है।
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